Saturday, 30 May 2015

गुस्से को करें डिलीट

गुस्सा इंसानी स्वभाव का हिस्सा है। लेकिन जब यह हद से गुजर जाता है, तो छोटी-सी बात को जिंदगी हिला देने वाले अंजाम की कगार पर लाकर खड़ा कर देता है। लोगों का गुस्सा हद से ज्यादा बढ़ रहा है और यह इंसानों के साथ-साथ इंसानी रिश्तों का भी खून कर रहा है। गुस्से के असर और उससे निपटने के तरीके एक्सपर्ट की मदद से बता रही हैं पूजा मेहरोत्रा:

राजकिशोर को वैसे तो सब पसंद करते हैं, लेकिन उसके गुस्से से सबको डर लगता है। मूड हद से ज्यादा खराब हुआ नहीं कि गुस्से का पारा आसमान छूने लगता है। कॉल न लगने पर मोबाइल दीवार पर मार देना, हॉर्न पर साइड न देने पर हाथापाई हो जाना, डिस्कशन करते-करते आवाज तेज होने के साथ चेहरा लाल कर लेना, राजकिशोर के गुस्से के साइड इफेक्ट्स हैं। परिजनों के बहुत जोर देने पर साइकायट्रिस्ट से मदद लेने के बाद अब राजकिशोर को गुस्सा तो आता है लेकिन हद के पार कभी नहीं जाता। बेशक अब परिजनों से ज्यादा राजकिशोर खुद खुश हैं।

क्या गुस्सा स्वाभाविक है
गुस्सा सभी को आता है। किसी को ज्यादा, किसी को कम। दिन में एक आधा बार गुस्सा आना नॉर्मल है। 


ऐसा होने पर हो जाएं सतर्क 
- यदि गुस्सा बार-बार आने लगे। ऐसा लगने लगे कि सभी आपको परेशान कर रहे हैं। 
- गुस्सा देर तक रहे। गुस्सा चंद मिनटों के बजाए कई दिनों तक दिमाग में घुमड़ता रहे।
- गुस्से में कुछ भी तोड़ने-फोड़ने का मन करे।
- अपने शरीर को नुकसान पहुंचाने में भी गुरेज न हो।

याद रखें कि ऐसे वक्त में भी गुस्से को एकदम से मनोरोग से जोड़ना गलत है। सभी गुस्सैल लोग मानसिक रूप से बीमार हों, यह जरूरी नहीं है। हां, कुछ लोगों में गुस्सा बीमारी का रूप ले सकता है। 

गुस्से को हम दो तरह से समझ सकते हैं:
पैसिव एंगर: नीचे दिए गए लक्षण अगर हैं तो कहीं न कहीं मन में पैसिव एंगर होगा।
- दूसरों की पीठ पीछे बुराई करना, आई कॉन्टैक्ट से बचना, दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश करना।
- खुद साइडलाइन होकर दूसरों को किसी के खिलाफ उकसाना, झूठे आंसू बहाना, अपने नेगेटिव विचार किसी शख्स के जरिये अपने दुश्मन तक पहुंचाना।
- खुद को हरदम दोषी मानना, बिना बात के बार-बार माफी मांगना।
- अविश्सनीय लोगों पर निर्भर होना, छोटी-छोटी बातों पर नाराज होना और महत्वपूर्ण चीजों को नजरंदाज कर देना, सेक्सुअली कमजोर होना।
- तमाम तरह के ऑब्सेसिव डिस्ऑर्डर। मसलन सफाई को लेकर कुछ ज्यादा चिंतित रहना, सभी से परफेक्शन की उम्मीद रखना, बार-बार चीजों को चेक करना और छोटी-छोटी बातों पर वहम करना।
- परेशानी की हालत में पीठ दिखा देना, बहस जैसी स्थितियों से दूर भागना।

अग्रेसिव एंगर
- दूसरों को धमकाना, छींटाकशी करना, मुक्का दिखाना, ऐसे कपड़ों और सिंबल का यूज करना जिनसे गुस्से का इजहार होता है, तेज आवाज में कार का हॉर्न बजाना।
- दूसरों पर फिजिकल अटैक करना, गालियां देना, अश्लील जोक सुनाना, दूसरों की भावनाओं की परवाह न करना, बिना किसी गलती के दूसरों को सजा देना।
- सामान तोड़ना, जानवरों को नुकसान पहुंचाना, दो लोगों के बीच के रिश्ते खराब कर देना, गलत तरीके से ड्राइव करना, चीखना-चिल्लाना, दूसरों की कमजोरी के साथ खेलना, अपनी गलती का दोषारोपण दूसरों पर करना।
- जल्दी-जल्दी बोलना, जल्दी-जल्दी चलना, ज्यादा काम करना और दूसरों से ऐसी उम्मीद रखना कि वे भी ऐसा ही करें।
- दिखावा करना, हर वक्त लोगों की अटेंशन चाहना, दूसरों की जरूरतों को नजरंदाज कर देना, लाइन जंप करना।
- पुरानी की बुरी यादों को हर वक्त याद करते रहना, दूसरों को माफ न कर पाना। 

गुस्से की मैकेनिजम
जब किसी शख्स को गुस्सा आने वाला होता है, तो उसके हाथ-पैरों में खून का बहाव तेज हो जाता है, दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, एड्रिनलिन हॉर्मोन तेजी से रिलीज होता है और बॉडी को इस बात के लिए तैयार कर देता है कि वह कोई ताकत से भरा एक्शन ले। इसके बाद गुस्सा व्यक्ति को धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में लेने लगता है, जिसकी वजह से शरीर में कुछ और केमिकल रिलीज होते हैं, जो कुछ पलों के लिए बॉडी को एनर्जी से भर देते हैं। दूसरी तरफ नर्वस सिस्टम में कॉर्टिसोल समेत कुछ और केमिकल निकलते हैं। ये केमिकल शरीर और दिमाग को कुछ पलों के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक प्रभावित करते हैं। ये दिमाग को उत्तेजित अवस्था में रखते हैं, जिससे दिमाग में विचारों का प्रवाह बेचैनी के साथ और बेहद तेज स्पीड से होने लगता है। 

बेकाबू गुस्से की वजहें
- धैर्य की कमी 
- सब कुछ अभी यहीं, तुरंत की चाह 
- कॉम्पिटिशन में सब कुछ पा लेने की इच्छा
- हमेशा खुद को आर्थिक तंगी से गुजरता हुआ ही महसूस करना
- लोगों के काम को लेकर काफी असंतोष 
- इमोशनल सपोर्ट सिस्टम का न होना
- अटैचमेंट की कमी
- टीवी, मोबाइल से लेकर विडियो तक में हर जगह हिंसा से सामना 

गुस्से की दोधारी तलवार
गुस्सा इंसान पर दोधारी तलवार की तरह असर करता है। एक तरफ गुस्सा इंसान को इमोशनली कमजोर करता है, तो शरीर के लेवल पर भी उसे खोखला बनाता जाता है। कभी-कभी लोग गुस्से में चुप हो जाते हैं तो कभी कुछ नहीं बोलते, बस चुपचाप एक ही जगह देखते रहते हैं। जबकि कुछ लोग ऐसी परिस्थति में चिल्लाने लगते हैं, हिंसक हो जाते हैं, खुद को नुकसान पहुंचाते हैं। जब गुस्सा हद से गुजर जाता है तो रोडरेज जैसी घटनाएं होती हैं। कभी-कभी लोग खुद को या फिर अपने आसपास पास के लोगों पर भी चिल्लाते हैं, आक्रामक हो जाते हैं। यहां तक कि आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। 

गुस्सा यदि अचानक और तेज आता है तो शरीर पर इसका बुरा असर पड़ता है।

गुस्से का इंसानी शरीर पर कुछ ऐसा असर पड़ता है: 
- बॉडी में एड्रिनलिन और नोराड्रिनलिन हॉर्मोंस का लेवल बढ़ जाता है।
- हाई ब्लड प्रेशर, सीने में दर्द, तेज सिर दर्द, माइग्रेन, एसिडिटी जैसी कई शारीरिक बीमारियां हो सकती हैं।
- जो लोग जल्दी-जल्दी और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते हैं, उन्हें स्ट्रोक, किडनी फेल्योर और मोटापा होने के चांस रहते हैं।
- ऐसा माना जाता है कि गुस्से में इंसान ज्यादा खाता है, जिसका रिजल्ट होता है मोटापा।
- ज्यादा पसीना आना, अल्सर और अपच जैसी शिकायतें भी गुस्से की वजह से हो सकती हैं।
- ज्यादा गुस्से की वजह से दिल की ब्लड को पंप करने की क्षमता में कमी आती है और इसकी वजह से हार्ट मसल्स डैमेज होने लगती हैं। इससे हार्ट अटैक होने की आशंका बढ़ जाती है।
- लगातार गुस्से से रैशेज, मुंहासे जैसी स्किन से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।
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मिथ मंथन

हम गुस्से को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं।
यह धारणा बिलकुल गलत है। गुस्से को दबाना या फिर नजरअंदाज करना हानिकारक साबित हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप चिल्लाने लगें, मारपीट करें, चीजें तोड़ें। आप अपने गुस्से को नियंत्रित करने के लिए उस समय उस जगह से हट जाएं। हो सके तो उस काम में अपना ध्यान लगाने की कोशिश करें, जो आपको पसंद है, मिसाल के तौर पर म्यूजिक या राइटिंग आदि। 

गुस्सा करने और चिल्लाने से इज्जत मिलती है।
यह गलत सोच है। आपके चिल्लाने या गुस्सा करने से लोग आपका सम्मान नहीं करते हैं, बल्कि आपसे डरते हैं या फिर आपसे दूरी बनाना शुरू कर देते हैं। गुस्से का रिस्पेक्ट और आपका काम बनने से कोई कनेक्शन नहीं है। हमेशा परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं होतीं और न ही हर परिस्थिति को आप कंट्रोल कर सकते हैं। फिर यह भी जरूरी नहीं कि डिमांड पूरी करवाने के लिए आप गुस्से में आ जाएं। अगर आप किसी चीज से खुश नहीं हैं तो नाराजगी बिना चिल्लाए या मारपीट किए बिना भी प्रदर्शित की जा सकती है।

एंगर मैनेजमेंट यानि गुस्से को दबाना सीखना 
गुस्सा न आना या कभी गुस्सा न होना, यह कोई अचीवमेंट नहीं है। क्योंकि गुस्सा एक स्वभाविक प्रक्रिया है। एंगर मैनेजमेंट वह प्रक्रिया है, जिसमें हम विपरीत परिस्थितियों में खुद को कैसे कंट्रोल रख कर परेशान होने से बचने के तरीके सीखते हैं।

एंगर मैनेजमेंट हमें यह सिखाता है कि दबाने की बजाए गुस्से को किस तरह के क्रिएटिव कामों में लगाकर, उससे बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है। गुस्सैल लोगों के लिए एंगर मैनेजमेंट के तरीके सीखना फायदेमंद हो सकता है।

क्योंकि अक्सर लोग सोचते हैं कि गुस्सा करना हेल्थ के लिए अच्छा है लेकिन ऐसा होता नही हैं।

कंट्रोल का फंडा
- गुस्सा यदि हदें पार कर रहा है, तो उसे चैनलाइज करना जरूरी है। इसके लिए सायकायट्रिस्ट से मदद ले सकते हैं।
- सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि आपके गुस्से का ट्रिगर कहां है। गुस्से की वजहें क्या हैं। किस बात से आपको बहुत तेजी से गुस्सा आता है, यह जानना जरूरी है। जब आपको इन सवालों का जवाब मिलने लगें तो ऐसी कंडिशन को चैनलाइज करने के कुछ उपाय अपना सकते हैं। जब आपको लगे कि आपके मन के अनुरूप काम नहीं हो रहा है और गुस्सा चरम पर पहुंचने की स्थिति में है तो डिस्ट्रैक्शन (अपने ध्यान को हटाने) की तकनीक अपनाएं। ऐसी चीजों के बारे में सोचें जो आपको अच्छी लगती हैं। मन ही मन में पसंद की कोई धुन गुनगुनाएं।
- किसी भी बात पर गुस्सा आने पर रिएक्ट करने से पहले मन में 1 से लेकर 10 तक गिनती गिनें। यह काफी पुरानी, लेकिन बेहतरीन टेक्निक है।
- गहरी-गहरी सांसें लें। आंख बंद करके कुछ देर शांत बैठने की कोशिश करें। पानी पिएं। विश्वास कीजिए, यह सोच एक दम गलत है कि गुस्से को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
- हो सके तो रोज सुबह हरे-भरे पार्क में घूमने जाएं। हरा रंग और ताजी हवा मन से गुस्से को पिघला देती है। बागवानी करने से भी गुस्से पर काबू करना आसान हो जाता है।
- हर एक्शन से पहले एक बार उसके अंजाम बारे में सोचें। धैर्य से काम लें। 
- कल जो हो गया, उसके लिए आप कुछ नहीं कर सकते और भविष्य में जो होने वाला है, उस पर आपका कोई कंट्रोल नहीं है, इसलिए वर्तमान में जिएं। पिछली बातों और आगे की चिंता में आज खराब न करें।
- एक डायरी बनाएं और उसमें गुस्सा आने की वजह को लिखें। इस तरह से आप खुद को जान सकेंगे। ऐसा करके खुद पर काबू पाना आसान हो जाता है।
- यह मान कर चलें कि हर बार काम आपके मन मुताबिक नहीं होगा। ऐसे में परफेक्शन का चक्कर छोड़ें और जिंदगी जैसी है, उसे वैसा ही स्वीकार करें।
- परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखें। किसी भी बुरी परिस्थिति में शांत रहने का सबसे पहला और अच्छा तरीका है कि सबसे पहले तो यह मानें कि परिस्थिति बुरी है। इस तरह से आप समस्या सही आकलन करके गुस्से पर आसानी से काबू पा सकेंगे।
- किसी भी तरह की एक्सरसाइज जरूर करें। इससे मन हल्का रहता है और जल्दी गुस्सा नहीं आता है।

योग का लें सहारा

अर्धधनुरासन: पैरों को जोड़कर पेट के बल लेट जाएं। ठोढ़ी और हाथों को जमीन पर लगा लें। आपकी हथेलियों फर्श की तरह होनी चाहिए। बाएं घुटने को मोड़े और बाएं हाथ को पीछे ले जाकर एड़ी को पकड़कर ऊपर की ओर उठाएं। सांस ले और बाएं पैर समेत शरीर के पूरे बाएं हिस्से को ऊपर की ओर उठाऐं। गर्दन को पीठ की दिशा में ही रखें। दाएं हाथ को फर्श पर रखते हुए ही आगे की ओर ले जाएं। इसी स्थिति में 2-6 बार तक लंबी सांस लें और धीरे—धीरे छोड़ें।

गुप्त पद्मासन: पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाए। अपने हाथों को आगे बढ़ाते हुए हिप्स को उठाएं और घुटनों के बल खड़े हो जाएं। धीरे-धीरे शरीर के अगले हिस्से को फर्श की ओर ले जाएं। ठोढ़ी को फर्श से लगाएं। हथेलियों को पीछे ले जाएं और कोशिश करें कि दोनों हाथों से सिर को छू सकें। आंखों को बंद कर, रिलेक्स करें, फिर से आसन दोहराएं।

शवासन: आंखें बंद करके जमीन पर लेट जाएं। लम्बी सांस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। सिर से लेकर पैर तक अपने शरीर के हर हिस्से पर ध्यान दें। किसी भी योगासन को रोजाना कम से कम 21 दिन करने से रिजल्ट अच्छे आते हैं। हर पोजिशन में एक बार में 1 मिनट तक रहना चाहिए।

सर्वांग आसन: अपने हाथ और पैर सीधे करके जमीन पर लेट जाएं और गहरी सांस लेते हुए अपने दोनों पैरों को सीधे, ऊपर की और उठाएं।
- पद्मासन में बैठकर ओम का जाप करें।
- इन प्राणायाम को रोजाना करें : अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका और भ्रामरी।
- जिस वक्त गुस्सा आ रहा हो, उस वक्त आंखें बंद करें और अपना ध्यान सांसों पर केंद्रित कर दें। डीप ब्रीदिंग करें।

जब गुस्सैल से हो सामना 
यदि सड़क या ऑफिस में किसी गुस्सैल से सामना हो जाए तो उससे इन आसान तरीकों से निपटें : 
- प्यारी सी मुस्कान दीजिए। एक मासूम मुस्कान वो कमाल कर सकती है, जो कई घंटों तक तेज आवाज से नहीं किया जा सकता।
- अगर सामने वाला गुस्सा हो तो उससे पहले मुस्कुराते हुए माफी मांगे। 'सॉरी' बोल कर अपनी बात रखें। सॉरी बोलना बड़प्पन की निशानी है, बुजदिली की नहीं। 
- किसी भी तरह का गुस्से वाला रिएक्शन देने से बचें, बहस न करें।
- यदि आपको गुस्सा आ रहा है, तो आप अपना ध्यान उस बात से हटाने की कोशिश करें। जो शख्स आप पर गुस्सा कर रहा है, उसके चेहरे की जगह अपनी फेवरिट पर्सनैलिटी का चेहरा देखने की कोशिश करें। आप पाएंगे कि आप कंट्रोल में हैं।

जब बच्चा करे गुस्सा
बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए हर तरह का पैंतरा आजमाते हैं और उनमें से एक गुस्सा भी है। गुस्से में बच्चे सामान तोड़ने-फोड़ने से लेकर, चिल्लाने, रोने, पैर पटकने और जमीन पर लेटने तक, तरह-तरह की हरकतें करते हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कब बच्चा गुस्से का सेफ बैरियर पार कर रहा है।

ऐसा होने पर सोचें
- डिमांड पूरी न होने पर कुछ देर के लिए रोना-चिल्लाना-जमीन पर लोटना सामान्य है लेकिन अगर यह बिहेवियर घंटों तक खिंचता है, तो आपको चिंता करनी चाहिए।
- दूसरे बच्चों को बात-बात पर पीटने और जानवरों को पीटने की आदत वाले बच्चों पर भी खास ध्यान देने की जरूरत है। अगर ऐसा अग्रेसिव बिहेवियर बार-बार मना करने से भी नहीं रुक रहा तो सायकायट्रिस्ट से जांच करवाई जा सकती है।

क्या करें
- यदि बच्चा बात-बात पर गुस्सा होता है, तो उसकी एनर्जी को सही जगह लगाने के लिए उसके इंटरेस्ट के हिसाब से खेलकूद, पेंटिग, म्यूजिक या अन्य क्रिएटिविटी की ओर ले जाने का प्रयास करें। 
- पैरंट्स को वक्त-वक्त पर स्कूल टीचर्स से बात करके बच्चे के स्वभाव के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए। गुस्सैल स्वभाव से निपटने के लिए स्कूल टीचर्स की मदद भी ली जा सकती है। 
- अक्सर यह देखा गया है कि यदि गुस्सैल बच्चों को बातें प्रैक्टिल करके समझाई जाए तो वो गलती जल्दी मान लेते हैं। 
- यदि बच्चा जिद्दी और गुस्सैल हो रहा है तो उसे बच्चा समझकर नजरअंदाज न करें, बल्कि उसे तुरंत समझाना शुरू करें।

एक्सपर्ट्स पैनल
डॉ. समीर पारिख,
साइकॉलजिस्ट, फोर्टिस हॉस्पिटल

प्रो. राजेश सागर
सायकायट्रिस्ट, एम्स

प्रो. नवीन ग्रोवर,
इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहैवियर एंड अलाइड साइंसेज, नई दिल्ली

प्रो. बद्री नारायण,
सोशलॉजिस्ट, जी बी पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद

डॉ. अनिल बंसल
सीनियर फिजिशन

Saturday, 23 May 2015

ये कैसी महिला सुरक्षा है

न एनाउंसमेंट हो रही थी और न भीड को नियंत्रित करने के लिए अधिकारी मुस्‍तैद थे

पूजा मेहरोत्रा
महिलाओं को दिल्‍ली मेट्रो ने शनिवार बहुत बड़ा धोखा दिया। उन्‍हें न तो कई वर्षों से आ‍रक्षित पहले कोच में जगह मिली और न ही शनिवार को एनाउंस किए गए आखिरी कोच में। यह सिलसिला पूरे दिन चलता रहा। इसका संज्ञान लेने की जहमत न तो दिल्‍ली मेट्रो के अधिकारियों ने उठाई और न सुरक्षा की गारंटी भरने वाली सीआइएसएफ की टीम ने। उन्‍होंने मान लिया है कि दिल्‍ली मेट्रो में चढने वाले सभी यात्री अखबार पढते हैं और वे इतने समझदार हैं कि अपने आप ही सबकुछ मैनेज कर लेंगे। कशमीरी गेट पर रात प्‍लेटफाॅर्म नंबर चार दिलशाद गार्डन के रूट पर एक महिला गार्ड पूरी भीड को नियंत्रित करने की नाकामयाब कोशिश कर रही थी। वहीं महिला यात्री दबी जुबान से दिल्‍ली मेट्रो और सीआइएसएफ को कोसती जा रही थीं।
बदकिस्‍मती से रात 8 45 की मेट्रो में चढने जब मैं कशमीरी गेट पहुंची। नजरा बिलकुल उलट पुलट था। दिलशाद गार्डन की ओर जाने वाली ट्रेन प्‍लेटफॉर्मपर थी। अगले डिब्‍बे में पुरष थे। महिलाओं ने दूसरी मेट्रो आने का इंतजार करना बेहतर समझा। दूसरी मेट्रो आई उसका भी यही हाल था, मेट्रो के पहले कोच में पुरुष भड़े हुए थे, किसी ने कहा आप लोग पीछे जाइए आज से आखिरी कोच आपका है। महिलाएं पीछे की ओर भागी। दूसरी मेट्रो भी निकल गई लेकिन महिलाओं ने देखा पीछे के कोच में भी पुरुष एक  के उपर एक चढे हुए हैं। कुछ महिलाएं पहले से कोच से आखिरी कोच की ओर तो कभी आखिरी कोच से पहले की कोच की तरफ भाग रही थीं। मैंने यह नजारा दस मिनट तक देखा, मुझे भीड के कम होने का इंतजार था। तब तक दो लडकियां जो काफी देर से मेट्रो को आता जाता देख रही थीं वो भी आई और कहा दोपहर में भी ऐसा ही हाल है। अब क्‍या करें। दूसरी ने कहा किसी में भी चल अब बस चल।  
दिल्‍ली मेट्रो ने शनिवार से दिलशाद गार्डन से रिठाला रूट या यूं कहें रिठाला से दिलशाद गार्डन रूट में महिलाओं का कोच आखिरी कोच घोषित तो कर दिया। लेकिन महिलाओं की सुरक्षा के पुख्‍ता इंतजाम ऐसे किए कि महिलाओं को न पहले कोच में जगह मिली और न ही आखिरी कोच में। महिलाओं की सुरक्षा का दावा करने वाली मेट्रो के सारे दावे दिलशाद गार्डनसे रिठाला और रिठाला से दिलशाद गार्डन रूट पर आज पूरे दिन खोखले साबित होते रहे। ये मेट्रो की नाकामी का ही नजारा था कि महिलाएं पूरे दिन असहज, दबी कुचली सी ट्रेवल करती नजर आईं। पूरे रूट पर कहीं कोई घोषणा नहीं की जा रही थी और न ही सीआइएसएफ के अधिकारी ही मौजूद थे। मौजूद थी एक छोटे कद की दबी कुचली सी सिक्‍योरिटी गार्ड जिसने सिर्फ यही कहा कि मैं चिल्‍ला चिल्‍ला कर थक चुकी हूं, लेकिन कोई सुन नहीं रहा है। सभी पीछे के कोच में चढ रहे हैं। मेट्रो का पहला कोच पहले ही पुरुषों से ठसाठस भड़ा था। सभी दांत खिसोर रहे थे और महिलाएं अपने लिए एक सुरक्षित कोना तलाश रही थी।  कुछ महिलाएं इस कन्‍फयूजन में आगे चढे या पीछे के चक्‍कर में दो तीन मेट्रो छोड भी चुकी थीं। तब तक एक लडकी मेरे पास आई और उसने पूछा मैम आपको पता है ये क्‍या कन्‍फयूजन है, मैंने कहा हां, मुझे पता है। बोली आज ऐसा क्‍यों हो रहा है। मैंने मुस्‍कुराते हुए कहा ये मेट्रो प्रशासन का फेल्‍योर , सीआइएसएफ की नजरअंदाजी और महिलाओं का सिर्फ घर पहुंचने से मतलब का नतीजा है। अगर सुबह से चार से पांच महिलाओं ने भी मेट़ो ट्रेनों के अंदर दिए गए नंबरों पर इस तरह की सूचना दी होती तो शायद यह नहीं होता। महिलाएं ऐसे तो पूरे पूरे दिन फोन पर गप्‍पे लगाती रहेंगी लकिन जब बात जागरूकता की हो तो उन्‍हें अपने चंद सिक्‍के भी कीमती नजर आने लगते हैं। तो यह हमारी कमजोरी है जिसे आप देख रही हैं।  
अब मैं कशमीरी गेट के आखिरी कोच के दूसरे दरवाजे पर खडी थी। वहां मुस्‍तैद दुबली पतली मडियल सी गार्ड से मैने पूछा आप यहां क्‍यों खडी हैं। झेंपते हुए बोली मैडम मैं यहा खडे आदमियों को यह बताने के लिए खडी हूं कि आप आगे जाइए ये महिलाओं का डिब्‍बा है। मुझे कोई नहीं सुन रहा। मै थक चुकी हूं। मैंने पूछा आपने सीआइएसएफ, स्‍टेशन मैनेजर को सूचित किया। बोली मैडम हमें यहां से हटने का ऑर्डर नहीं है। मेट्रो आ चुकी थी। गेट खुलने से पहले लोग घुसने को तैयार थे। वो चिल्‍ला रही थी। पहले यात्रियों को उतरने दीजिए। ये महिलाओं का कोच है। लेकिन सभी दांत निकालते हुए बोले मत सुनो इसे।
मेट्रो के अंदर मैंने पहुंचकर सबसे पहले हेल्‍पलाइन नंबर वाला स्‍टीकर तलाशना शुरू किया। पुरुष यात्री मजे से कह रहे थे जब तक एनाउंसमेंट नहीं होगे तब तक हम ऐसे ही चलेंगे। बहुत दिन महिलाओ को एक कोच स्‍पेशल दी गई है। खाने दो इन्‍हें भी धक्‍के।
मैंने मेट्रो हेल्‍पलाइन के लगे स्‍टीकर से सबसे पहले दिल्‍ली मेट्रो के हेल्‍प लाइन नंबर 011155370 पर फोन किया। शास्‍त्री पार्क आने तक और उसके बाद दूसरा स्‍टेशन आने तक वो इस परेशानी के लिए एक उसके लिए दो, फिर इसके लिए तीन जैसे कई ऑप्‍शन ही दिए जा रही थी। यानि जरूरत के समय आप ऑप्‍शन में ही खोकर हार जाएं ऐसा पुख्‍ता इंतजाम मेट्रो ने कर रखा है। हार कर मैंने सीआइएसएफ के नंबर 01122185555 पर फोन लगाया तब तक सीलमपुर स्‍टेशन आ चुका था। फोन उठाने वाले से
मैंने पूछा आज से महिलाओं के कोच की स्थिति क्‍या है?
बोला- मैडम आखिरी कोच।
 मैंने कहा जानकारी देने की क्‍या व्‍यवस्‍था की गई है?
 बोला मैडम इसकी जानकारी मुझे नहीं है,
मैंने कहा प्‍लैटफॉर्म पर आपके अधिकारी मौजूद नहीं है,
 बोला मैडम पहला दिन है इसलिए यह सब हो रहा है।
मैंने पूछा क्‍या सब हो रहा है?
बोला कि महिलाओं के कोच में पुरुष सफर कर रहे हैं।
मैंने पूछा कितने दिन तक सफर करेंगे, फिर सारी ट्रेन जेनरल होनी चाहिए आज से।
ये क्‍या जवाब है पहला दिन है? फिर आज से लागू ही नहीं करना था नियम।
बोला मैडम मैं सूचना दे रहा हूं, अधिकारियों को अगले स्‍टेशन पर अधिकारी होंगे। वो महिलाओं के कोच से पुरुषों को निकालेंगे।
एक के बाद एक शाहदरा, मानसरोवर, झिलमिल और दिलशाद गार्डन। न सीएसएफ का अधिकारी आया और न पुरुष महिलाओं के कोच से हटाए गए।

मेट्रो से, मेट्रो प्रशासन से मेरा बस एक ही सवाल है जब आप से ये मैनेज ही नहीं होना था जो व्‍यवस्‍था बनाई थी वही चलने देते। ये महिलाओं की सुरक्षा बढाई जा रही है या असुरक्षा। अगर एक्‍सपेरिमेंट ही करना है तो पुरुषों के साथ भी कीजिए। अगर फुल प्रूफ व्‍यवस्‍था नहीं थी तो घोषणा ही नहीं करनी चाहिए थी। ये कैसी महिला सुरक्षा है
?